यूपी में PDA राजनीति पर भाजपा की नई रणनीति तैयार
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की सियासत में अपनी पकड़ को दोबारा मजबूत करने के लिए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) अपने प्रांतीय संगठन में बहुत बड़ा फेरबदल करने जा रही है। राजधानी लखनऊ में रणनीतिक बैठकों के दौर के बाद पार्टी जल्द ही अपनी नई टीम का आधिकारिक ऐलान करेगी। इस नए सांगठनिक ढांचे के जरिए भाजपा की मुख्य रणनीति समाजवादी पार्टी (सपा) के 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) कार्ड को अपने खुद के नए 'पीडीए' यानी (पिछड़ा, दलित और अगड़ा) समीकरण से ध्वस्त करने की है।
इस नए सामाजिक संतुलन को धरातल पर उतारने के लिए भाजपा अपनी सभी छह क्षेत्रीय इकाइयों के अध्यक्षों और सातों मोर्चों के कप्तानों को बदलने जा रही है। इसके साथ ही प्रांतीय कार्यकारिणी में भी बड़े पैमाने पर बदलाव किया जाएगा। दिल्ली में केंद्रीय आलाकमान की अंतिम मंजूरी मिलने के बाद, प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी किसी भी क्षण अपनी नई कोर टीम की घोषणा कर सकते हैं। अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, मैराथन बैठकों के बाद न केवल नई सूची को अंतिम रूप दे दिया गया है, बल्कि शीर्ष नेतृत्व ने इस पर अपनी सहमति भी दे दी है।
नए चेहरों को 50 फीसदी जगह; गैर-यादव ओबीसी और अति-पिछड़ों पर फोकस
पार्टी की तय रणनीति के अनुसार, क्षेत्रीय कमेटियों और विभिन्न मोर्चों की कमान सौंपते समय अति-पिछड़ी जातियों, गैर-यादव पिछड़ा वर्ग और सवर्ण (अगड़ा) समाज के बीच एक मजबूत संतुलन बिठाया जाएगा। संगठन को युवा और ऊर्जावान लुक देने के लिए प्रांतीय कार्यकारिणी में करीब 40 से 50 प्रतिशत नए और युवा चेहरों को एंट्री दी जाएगी। इस पूरी कवायद में भाजपा का मुख्य फोकस अपने नए 'पिछड़ा, दलित, अगड़ा' वोट बैंक को पूरी तरह से संतुष्ट रखने पर रहेगा।
संघ और केंद्रीय नेतृत्व के साथ कई दौर की मंत्रणा के बाद बनी सूची
इस महाबदलाव की रूपरेखा तैयार करने के लिए प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी ने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन, राष्ट्रीय संगठन महासचिव बीएल संतोष और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के वरिष्ठ पदाधिकारियों के साथ व्यापक विचार-विमर्श किया। सभी पक्षों से विस्तृत इनपुट और जमीनी रिपोर्ट लेने के बाद अंतिम मसौदा केंद्रीय नेतृत्व के समक्ष प्रस्तुत किया गया था, जिसे अब हरी झंडी मिल चुकी है।
पिछले लोकसभा चुनाव के नतीजों से लिया सबक
दरअसल, बीते लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश के भीतर कश्यप, कहार, प्रजापति, बिंद और बुनकर जैसी अति-पिछड़ी जातियों के साथ-साथ कुर्मी समाज और दलित वर्ग की पासी, कोरी, वाल्मीकि व खटीक जातियों के एक बड़े धड़े ने सपा-कांग्रेस गठबंधन का रुख कर लिया था। इसके चलते भाजपा का पारंपरिक चुनावी गणित पूरी तरह प्रभावित हुआ था। अब नई टीम के गठन के जरिए भाजपा का मुख्य उद्देश्य इन रूठे हुए जातिगत समीकरणों को दोबारा अपने पाले में लाना और क्षेत्रवार राजनैतिक परिस्थितियों को अपने अनुकूल बनाना है।


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