इस बार विधानसभा चुनाव जीतकर ममता सीएम बनी तो तोड़ देंगी शीला दीक्षित का रिकॉर्ड
कोलकाता। पश्चिम बंगाल में इस साल अप्रैल में विधानसभा चुनाव होना है। सीएम ममता बनर्जी अगर अगले कार्यकाल में भी सीएम बनती हैं तो वे दिल्ली की भूतपूर्व सीएम शीला दीक्षित का रिकार्ड तोड़ देंगी। शीला दीक्षित 15 साल 25 दिन तक सीएम रही थीं। बंगाल में फिलहाल ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस एकमात्र पार्टी है, जो बीजेपी से लोहा लेती रही हैं। ममता ने अपने दम पर साढ़े 3 दशक से ज्यादा समय तक बंगाल में शासन करने वाले वामपंथी दलों के ग्रुप- लेफ्ट फ्रंट को सत्ताच्यूत करने में पहली बार 2011 में सफलता पाई थी। तब से वे बंगाल पर एकछत्र राज कर रही हैं। देश में बीजेपी के उभार और पीएम मोदी की लहर के बावजूद ममता ने टीएमसी को अभी तक मजबूत बनाए रखा है। बंगाल के पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने इस बार की तरह ही पूरी ताकत झोंक दी थी। पीएम मोदी से लेकर बीजेपी के तमाम छोटे-बड़े नेताओं ने बंगाल के तूफानी दौरे किए थे। नतीजे आए बीजेपी की सीटें विधानसभा में 2 से बढ़ कर 77 हो गईं। टीएमसी की सीटें भी घटीं, लेकिन ममता तीसरी बार सरकार बनाने में सफल रही।
विश्लेषकों ने इसे उनका करिश्मा नहीं, बल्कि मुस्लिम वोटों का ममता के पक्ष में इकतरफा ध्रुवीकरण माना। बंगाल में तकरीबन 30 फीसदी मुस्लिम आबादी है। टीएमसी को 2021 में 49 फीसदी वोट मिले थे। बीजेपी टीएमसी से 10 फीसदी वोट लाकर दूसरे नंबर पर रही। बीजेपी के प्रबल विरोध के बावजूद अपनी जीत से उत्साहित ममता ने पीएम बनने के सपने भी देखने शुरू कर दिए थे।
रिपोर्ट के मुताबिक शीला दीक्षित सबसे लंबे समय तक दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं। वे 3 दिसंबर 1998 से 28 दिसंबर 2013 तक दिल्ली की सीएम रहीं। उनका कुल कार्यकाल 15 साल 25 दिन का रहा। उनके नाम एक और रिकार्ड है। दिल्ली में पुरुष और महिला मुख्यमंत्रियों में उनका नाम सर्वाधिक समय तक सीएम रहने वालों में सबसे ऊपर है। सीएम के रूप में उन्होंने दिल्ली को विश्वस्तरीय शहर बनाने में अहम योगदान दिया। शीला दीक्षित के बाद महिला मुख्यमंत्रियों में सर्वाधिक समय का रिकार्ड ममता बनर्जी ने बना लिया है। ममता ने करीब 14 साल से अधिक का रिकार्ड बना लिया है, जो शीला दीक्षित से कुछ ही महीने कम है। लंबे समय तक सीएम रहने वाली तीसरी सीएम रहीं जे जयललिता वे 14 साल और 124 दिन तक तमिलनाडु की सीएम रही थीं।
बता दें देश में अब तक कुल 18 महिला मुख्यमंत्री बनी हैं। पहली महिला मुख्यमंत्री के रूप में सुचेता कृपलानी का नाम आता है। वे 1963 में यूपी की सीएम बनीं। दूसरी सीएम रहीं शीला दीक्षित। वे दिल्ली 15 साल से अधिक समय तक मुख्यमंत्री रहीं। पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी 2011 से अब तक सीएम पद पर हैं। अन्य महिला मुख्यमंत्रियों में सुचेता कृपलानी, नंदिनी सत्पथी (ओडिशा), शशिकला काकोडकर (गोवा), सैयदा अनवरा तैमूर (असम), वीए जानकी रामचंद्रन (तमिलनाडु), जे जयललिता (तमिलनाडु), मायावती (उत्तर प्रदेश), राजिंदर कौर भट्टल (पंजाब), राबड़ी देवी (बिहार), सुषमा स्वराज (दिल्ली), उमा भारती (मध्य प्रदेश), वसुंधरा राजे (राजस्थान), आनंदीबेन पटेल (गुजरात), मेहबूबा मुफ्ती (जम्मू-कश्मीर), आतिशी (दिल्ली) और रेखा गुप्ता (दिल्ली)।
ममता बनर्जी की मूल पार्टी कांग्रेस रही है। बाद में उन्होंने अपनी पार्टी- टीएमसी बनाई। वामपंथी शासन से लगातार लडती रहीं। आखिरकार उन्हें 2011 में वामपंथी शासन को खत्म करने में सफलता मिली। तब से उन्होंने दो अहम काम किए हैं। आधी आबादी के रूप में ख्यात महिला शक्ति को अपने साथ जोड़े रखने के लिए उन्होंने उनके लिए गर्भावस्था से लेकर बुढ़ापे तक के लिए कई कल्याणकारी योजनाएं चलाईं। उनकी लक्खी भंडार योजना बमाल की महिलाओं में सबसे पापुलर है। इसके अलावा भी उन्होंने कई योजनाएं युवाओं के लिए भी चलाई हैं। नतीजा यह कि मौजूदा विधानसभा में बीजेपी को छोड़ कांग्रेस और वामपंथी पार्टियों के साथ दूसरी विरोधी भी शून्य पर हैं।
ममता बनर्जी यह भी समझ रही हैं कि बीजेपी से मुकाबला इस बार पहले के मुकाबले थोड़ा कठिन है। इसकी वजह यह है कि पिछली बार उन्हें जो 49 फीसदी वोट मिले थे, उसमें 30 फीसदी तो अकेले मुस्लिम थे। बीजेपी को सत्ता से दूर रखने के लिए मुसलमानों ने कांग्रेस और वामपंथियों का मोह त्याग कर एकमुश्त टीएमसी को वोट किया था यानी 70 फीसदी हिन्दुओं में सिर्फ 19 फीसदी वोट ही उन्हें मिले थे1 इस बार टीएमसी से निष्कासित नेता हुमायू कबीर के अलग पार्टी बना लेने से मुस्लिम वोटों में विभाजन का खतरा पैदा हो गया है। ओवैसी ने भी हुमायू कबीर से हाथ मिला लिया है1 यह मुस्लिम मतों में विभाजन का स्पष्ट संकेत है। तीसरा खतरा बन कर उभरी हैं ईडी और सीबीआई जैसी केंद्री जांच एजेंसियां उनसे ममता लगातार पंगा लेती रही हैं, लेकिन आई-पैक रेड मामले में उनकी परेशानी बढ़ सकती है।


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